
वासुदेव शर्मा
मप्र के शिक्षक किसी मुगालते में नहीं रहे, भाजपा की सरकार किसी तरह का रहम करने वाली नहीं है, वह टीईटी के जरिए अयोग्य साबित कर बिना आर्थिक लाभ दिए अनिवार्य सेवानिवृत्ति देगी, ठीक वैसे ही जिस तरह 2018 में परीक्षा लेकर 16 अध्यापकों को हटा दिया गया था, यह वीआरएस के लिए छोटा सा प्रयोग था, जो सफलतापूर्वक किया जा चुका है, तब किसी संगठन ने सरकार के इस निर्णय के खिलाफ मुंह नहीं खोला था, अब भी नहीं खोलेंगे, इसलिए तथाकथित सरकार के जयकारे लगाने वाले संगठनों पर निर्भरता खत्म कर, इस संकट से निबटने की तैयारी खुद ही करनी होगी, ठीक वैसे ही जैसे 2017 में अध्यापक संघर्ष समिति बनाकर अपने सवाल अपनी दम पर उठाकर शिक्षा विभाग में सिविलियन का रास्ता बनाया था! 24 सितंबर 2017 के आयोजन को “छिंदवाड़ा क्रांति” कहा जाता है, जहां से “केश त्याग” जैसा सरकार को हिला देने वाले आंदोलन की उत्पत्ति हुई, जिसका नतीजा शिवराज सिंह की हार के रूप में सामने आया! यदि अनिवार्य पात्रता परीक्षा, ई-अटेंडेंश जैसे डराने वाले सरकार के निर्णयों से मुक्ति पानी है, तब एक बार फिर कुशल रणनीतिकार के साथ बैठना ही होगा!
अनिवार्य सेवानिवृत्ति देना सरकार का लक्ष्य!
कुछ ही सालों में 22,400 प्राईमरी, माध्यमिक स्कूल बंद हो चुके हैं, टीईटी भी इन्हीं स्कूलों में पढाने वाले शिक्षकों को देनी है, अगले कुछ सालों में प्राईमरी, मिडिल स्कूल और अधिक संख्या में बंद होने हैं क्योंकि सरकार 90,000 हजार सरकारी स्कूलों में पढाने वाले 3.5 लाख शिक्षकों को 350 सीएम राईज स्कूलों तक सीमित करना चाहती है, जहां पढाने के लिए सरकार को सिर्फ 50,000 शिक्षक चाहिए, बाकी बचे 3 लाख शिक्षकों से सरकार मुक्ति पाना चाहती है, यह काम वह टीईटी के जरिए ही कर सकती है, इसलिए ही टीईटी पूरी प्लानिंग के साथ बंद हो रहे प्राईमरी और मिडिल स्कूल के शिक्षकों की छंटनी करने के लिए अनिवार्य की जा रही है, इससे स्पष्ट है कि सरकार का लक्ष्य अनिवार्य सेवा निवृत्ति देना है वह भी बिना आर्थिक लाभ दिए क्योंकि परीक्षा देकर अयोग्य साबित हो चुके किसी आर्थिक लाभ के हकदार नहीं होंगे, यह बात सभी शिक्षक समुदाय को समझनी चाहिए।





