
साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए भक्तों को मिलेंगे इकलौते सर्प सिंहासन पर बैठे उमा-महेश्वर के दुर्लभ दर्शन, कालसर्प दोष निवारण के लिए देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालु।
उज्जैन/भोपाल।
मध्य प्रदेश की पवित्र धार्मिक नगरी उज्जैन में आज आस्था, श्रद्धा और कौतूहल का एक अभूतपूर्व संगम देखने को मिल रहा है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल (शीर्ष खंड) पर विराजमान भगवान श्री नागचंद्रेश्वर महादेव के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार और विशेष त्रिकाल पूजा के बाद खोल दिए गए हैं। महानगरी उज्जैन में पूरे 7 साल बाद यह बेहद दुर्लभ और शुभ महासंयोग बना है, जब नाग पंचमी का महापर्व और सावन मास का तीसरा सोमवार एक ही दिन पड़ रहे हैं।
मध्य प्रदेश की पवित्र धार्मिक नगरी उज्जैन में आज आस्था, श्रद्धा और कौतूहल का एक अभूतपूर्व संगम देखने को मिल रहा है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल (शीर्ष खंड) पर विराजमान भगवान श्री नागचंद्रेश्वर महादेव के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार और विशेष त्रिकाल पूजा के बाद खोल दिए गए हैं। महानगरी उज्जैन में पूरे 7 साल बाद यह बेहद दुर्लभ और शुभ महासंयोग बना है, जब नाग पंचमी का महापर्व और सावन मास का तीसरा सोमवार एक ही दिन पड़ रहे हैं।
साल में सिर्फ 24 घंटे खुलते हैं कपाट
सनातन परंपरा में नागचंद्रेश्वर मंदिर अपनी अनूठी और रहस्यमयी परंपरा के लिए विख्यात है। इस मंदिर के कपाट पूरे 364 दिन बंद रहते हैं और केवल श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी (नाग पंचमी) के दिन मात्र 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। मंदिर प्रबंध समिति के अनुसार, कपाट 16 अगस्त की मध्यरात्रि 12:00 बजे खोल दिए गए हैं, जो आज 17 अगस्त की रात 12:00 बजे तक लगातार आम श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु खुले रहेंगे। इसके बाद भगवान के पट पुनः एक वर्ष के लिए बंद कर दिए जाएंगे।
विश्व की एकमात्र दुर्लभ प्रतिमा: सर्प शैया पर आसीन हैं महादेव
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित 11वीं शताब्दी की अत्यंत अद्भुत और दुर्लभ ऐतिहासिक प्रतिमा है। सामान्यतः हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु को शेषनाग की शैया पर विश्राम करते देखा जाता है, लेकिन यह विश्व का इकलौता ऐसा विग्रह है जहां स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती अपने पुत्र गणेश जी के साथ विशाल 11 फन वाले दशमुखी सर्पराज तक्षक के सिंहासन पर आसीन हैं। मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से ही जातकों की कुंडली के बड़े से बड़े पितृदोष और भयंकर कालसर्प दोष का पूर्ण निवारण हो जाता है।