
बालाघाट: मध्य प्रदेश के बालाघाट mp balaghat patrakar जिले के बैगा-गोंद बाहुल्य आदिवासी इलाकों में दूषित पानी और बीमारियों से 32 मासूम बच्चों की मौत का मामला थमा भी नहीं था कि अब इस पर एक नया प्रशासनिक और मीडिया विवाद खड़ा हो गया है। जिला मुख्यालय पर रविवार को बालाघाट के पत्रकारों ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई। इस बैठक में पत्रकारों ने जिले की छवि खराब करने वाले और भोपाल से प्रायोजित होकर आए ‘बेलगाम’ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ कड़ा आक्रोश व्यक्त किया।
इतना ही नहीं, बैठक में मौजूद सरकारी तंत्र (जनसंपर्क विभाग) के अधिकारियों को पत्रकारों ने दोटूक शब्दों में खरी-खोटी सुनाते हुए चेतावनी दी कि यदि इन बाहरी तत्वों की हरकतों के लिए माफी नहीं मांगी गई, तो स्थानीय मीडिया सरकारी खबरों का पूर्ण बहिष्कार करेगा।
क्या है पूरा विवाद? क्यों भड़के स्थानीय पत्रकार?mp balaghat patrakar
दरअसल, बालाघाट के सुदूर आदिवासी गांवों में प्रशासनिक लापरवाही के कारण बड़े पैमाने पर बच्चों की मौतें हुईं। स्थानीय पत्रकारों ने पूरी मुस्तैदी से इस जमीनी हकीकत और प्रशासन की विफलता को उजागर किया था। इसके बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब कर लिया।
आरोप है कि अपनी नाकामी छुपाने और सरकार की छवि चमकाने के लिए शासन-प्रशासन द्वारा भोपाल से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की एक फौज को बालाघाट के ग्रामीण इलाकों में भेजा गया। इन बाहरी इन्फ्लुएंसर्स ने जमीनी समस्याओं को समझने के बजाय वहां का माहौल बिगाड़ना शुरू कर दिया।
शनिवार को हुआ हाई-वोल्टेज ड्रामा
विवाद तब चरम पर पहुंच गया जब शनिवार को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके प्रभावित परिवारों से मिलने गांवों में पहुंचे। वहां भोपाल से आए इन इन्फ्लुएंसर्स के समूह ने (जिसमें माइक हाथ में लिए कुछ महिलाएं भी शामिल थीं) दीपके को घेर लिया और उनके साथ दुर्व्यवहार व तीखी बहस बाजी की। इन्फ्लुएंसर्स ने दीपके पर “लाशों पर राजनीति” करने का आरोप लगाते हुए कैमरा के सामने हुड़दंग मचाया।
इससे पहले इन इन्फ्लुएंसर्स ने बालाघाट के जिला कलेक्टर के साथ भी बिना उचित जवाब सुने केवल एकतरफा सवाल दागकर माहौल खराब करने का प्रयास किया था।
बैठक में पत्रकारों ने सरकारी तंत्र को सुनाई खरी-खोटी mp balaghat patrakar
इन्फ्लुएंसर्स के इस तमाशे और स्थानीय पत्रकारिता को बदनाम करने की कोशिश के विरोध में रविवार को बालाघाट के वरिष्ठ पत्रकारों की बड़ी बैठक हुई। बैठक में जिला जनसंपर्क अधिकारी (PRO) और सहायक जनसंपर्क अधिकारियों को भी तलब किया गया था।
वरिष्ठ पत्रकारों ने अधिकारियों के सामने स्पष्ट शब्दों में कहा:
- “छवि चमकाना बंद करें”: अगर सरकार को अपनी कमियां छुपाने के लिए बाहर से इन्फ्लुएंसर्स बुलाने हैं तो बुलाए, लेकिन स्थानीय पत्रकारों और बालाघाट की छवि खराब करने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी।
- “पत्रकारों को आपस में लड़ाने की साजिश”: स्थानीय पत्रकारों ने आरोप लगाया कि शासन-प्रशासन जानबूझकर पत्रकारों और बाहरी यूट्यूबर्स/इन्फ्लुएंसर्स को आपस में लड़ाकर मूल मुद्दे (बच्चों की मौत) से ध्यान भटकाना चाहता है, जो बालाघाट में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
- बहिष्कार का अल्टीमेटम: पत्रकारों ने साफ कहा है कि अगर इस घटिया पीआर स्टंट के लिए प्रशासन और उन इन्फ्लुएंसर्स द्वारा माफी नहीं मांगी गई, तो जिले का पूरा मीडिया तंत्र सरकारी विज्ञापनों और प्रशासनिक खबरों का पूरी तरह से बहिष्कार कर देगा।
बालाघाट के पत्रकारों के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि आदिवासियों की मौत जैसे संवेदनशील मुद्दे पर किसी भी तरह की ‘डिजिटल रील्स बाजी’ या झूठी छवि चमकाने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब देखना यह है कि इस करारे जवाब के बाद मध्य प्रदेश का गृह और जनसंपर्क विभाग बैकफुट पर आकर स्थानीय मीडिया से कैसे तालमेल बिठाता है।
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ये कोई मामूली घटना नहीं थी। बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों को लेकर पहले से गंभीर सवाल उठ रहे थे। अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी राज्य सरकार और बालाघाट कलेक्टर से जवाब माँगा है। तो ऐसे समय में पत्रकारों की आवाज़ कमजोर पड़ना और भी गंभीर सवाल खड़े करता है।




