
ब्यूरो रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता (Maintenance) पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि यदि पत्नी का विवाहेतर संबंध (Adultery) प्रथम दृष्टया साबित हो जाता है, तो उसे अंतरिम और अंतिम दोनों तरह के गुजारे भत्ते से वंचित किया जा सकता है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि पति के ऐसे आरोपों और सबूतों की जांच के लिए अंतिम फैसले तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है, बल्कि शुरुआती (अंतरिम) चरण में ही इस पर सुनवाई होनी चाहिए.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने राजस्थान (उदयपुर) से जुड़े ‘हिमांशु चोर्डिया बनाम राजस्थान राज्य’ मामले में यह फैसला सुनाया.
फैसले की मुख्य बातें और कानूनी बारीकियां
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भरण-पोषण कानून और उसके अपवादों को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है:
- अंतरिम चरण में ही होगी जांच: अदालत ने कहा कि यदि पति मामले की शुरुआती स्टेज पर ही पत्नी के व्यभिचार में रहने के ठोस सबूत पेश करता है, तो निचली अदालत अंतरिम भत्ते का आदेश देने से पहले उस पर विचार करेगी. मामले को अंतिम सुनवाई तक टाला नहीं जा सकता.
- CrPC की धारा 125(4) का हवाला: कानून की इस धारा (जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS की धारा 144 है) के तहत यदि पत्नी व्यभिचार में रह रही है, तो वह किसी भी तरह का भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है.
- सिर्फ कोरे आरोप काफी नहीं: कोर्ट ने चेतावनी भी दी कि केवल शक या झूठे आरोप लगाने से गुजारा भत्ता नहीं रुकेगा. पति को अदालत के सामने ऐसे विश्वसनीय साक्ष्य (Prima Facie Evidence) रखने होंगे जो पहली नजर में सच दिखें.
- सबूतों पर पत्नी का अधिकार: मामले में पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (जैसे तस्वीरें या वीडियो) की वैधता और सत्यता पर सवाल उठाने का पत्नी को पूरा कानूनी अधिकार होगा.
प्राइवेट जासूसों (Private Detectives) के इस्तेमाल पर जताई चिंता
इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण विषय पर ध्यान आकर्षित किया. कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में सबूत जुटाने के लिए प्राइवेट जासूसों की बढ़ती मदद और निगरानी पर गंभीर चिंता व्यक्त की. सुप्रीम कोर्ट ने देश के विधि मंत्रालय (Ministry of Law and Justice) और विधि आयोग (Law Commission) को इस संबंध में जवाबदेही और नियम तय करने के लिए उचित कानून बनाने का निर्देश दिया है.






