
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
भारत की सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था ने सदियों से विषमता पैदा की है, लेकिन इतिहास गवाह है कि कई ब्राह्मण पंडितों और विचारकों ने दलित उत्थान के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। यह लेख पंडित गंगाराम (पंजाब), पंडित मदन मोहन मालवीय (बीएचयू), पंडित सोमनाथ (हिमाचल), वीर सावरकर, पंडित श्रीराम शर्मा और भगत फूलसिंह के कार्यों की विवेचना करता है। इनकी सामूहिक प्रयासों से दलितों को धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक समानता मिली, जो भारत की आजादी से पहले सामाजिक विषमता मिटाने का प्रतीक है। विशेष रूप से, ये कार्य ऐसे थे जो दलित नेताओं द्वारा नहीं किए गए—जैसे दलितों को पुरोहित बनाना, मंदिरों में प्रवेश दिलाना, शुद्धि आंदोलन चलाना और अनशन के माध्यम से अधिकार दिलाना। दलित नेता जैसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने राजनीतिक और कानूनी संघर्ष पर जोर दिया, लेकिन ब्राह्मण सुधारकों ने धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर जातिगत भेदभाव को सीधे चुनौती दी, जो हिंदू समाज के भीतर समावेश की नींव रखता था।
#### 1. *पंडित गंगाराम: पंजाब में दलित शुद्धि के अग्रणी*
पंजाब के पंडित गंगाराम आर्य समाज के प्रमुख सदस्य थे, जिन्होंने 20वीं शताब्दी की शुरुआत में दलितों की शुद्धि और उत्थान के लिए अभूतपूर्व कार्य किया। उन्होंने लाखों दलितों को हिंदू धर्म में सम्मानजनक स्थान दिलाया, उन्हें शुद्धि कराकर मुख्यधारा में शामिल किया। आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने दलितों की रक्षा की और उन्हें शिक्षा एवं धार्मिक अधिकार दिए, जो उस समय की कट्टरता के खिलाफ था। हरिद्वार में वे अनुसूचित जातियों के लिए पुरोहित बने, दलितों के संस्कार करवाते थे और उनके बहिखाते बनाते थे।
*विवेचना*: गंगाराम जी के प्रयास दलितों को धार्मिक पहचान देने वाले थे, जो दलित नेताओं के राजनीतिक संघर्ष से अलग थे। आजादी से पहले यह कार्य सामाजिक विषमता मिटाने का प्रारंभिक कदम था, जिसने पंजाब में दलित जागृति पैदा की।
#### 2. *पंडित मदन मोहन मालवीय: शिक्षा के माध्यम से उत्थान*
पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना की, जो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति थी। उन्होंने दलितों और पिछड़ों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराई, जो उस समय ब्राह्मणों तक सीमित थी। मालवीय जी ने सती प्रथा, बाल विवाह और जातिगत भेदभाव का विरोध किया, तथा बीएचयू में सभी वर्गों के लिए दरवाजे खोले। वे चंदा इकट्ठा करने के लिए देशभर घूमे, यहां तक कि हैदराबाद के निजाम की जूती नीलाम करने का ऐलान किया।
*विवेचना*: मालवीय जी का योगदान शैक्षिक समानता पर केंद्रित था, जो दलित नेताओं के कानूनी प्रयासों से पहले आया। आजादी से पूर्व यह कार्य सामाजिक विषमता को ज्ञान से मिटाने का उदाहरण है, जिसने दलितों को बौद्धिक रूप से सशक्त बनाया।
#### 3. *पंडित सोमनाथ: हिमाचल में अनशन के योद्धा*
हिमाचल प्रदेश के पंडित सोमनाथ ने दलितों के अधिकारों के लिए अमर अनशन किया। वे ब्राह्मण होते हुए भी दलितों को उनका हक दिलाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठे, जो सामाजिक न्याय की मिसाल है। उनके प्रयासों से दलितों को मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश मिला।
*विवेचना*: सोमनाथ जी का अनशन दलित उत्थान में व्यक्तिगत बलिदान का प्रतीक है, जो दलित नेताओं के सामूहिक आंदोलनों से भिन्न था। आजादी से पहले यह कार्य हिमाचल में विषमता मिटाने का साहसिक कदम था।
#### 4. *वीर सावरकर: अस्पृश्यता के विरुद्ध क्रांतिकारी*
वीर सावरकर ने रत्नागिरी में छुआछूत के खिलाफ आंदोलन चलाया। उन्होंने पतित पावन मंदिर स्थापित किया, जहां दलितों को प्रवेश और पूजा का अधिकार दिया। सहभोज, मंदिर प्रवेश और जाति उन्मूलन के लिए उन्होंने सात बेड़ियां तोड़ने का सिद्धांत दिया। सावरकर ने महाड़ सत्याग्रह का समर्थन किया और अस्पृश्यता को जड़ से समाप्त करने की वकालत की।
*विवेचना*: सावरकर के कार्य धार्मिक समावेश पर थे, जो दलित नेताओं के संवैधानिक संघर्ष से पहले आए। आजादी से पूर्व यह सामाजिक विषमता मिटाने का व्यावहारिक प्रयास था।
#### 5. *पंडित श्रीराम शर्मा: जाति उन्मूलन के प्रणेता*
पंडित श्रीराम शर्मा ने अखिल विश्व गायत्री परिवार स्थापित किया और दलितों को मंदिरों में पुजारी बनाया, जनेऊ दिया, वेद मंत्र सिखाए तथा यज्ञ करवाया। उन्होंने जाति-पांति का भेद मिटाकर आदिवासियों और दलितों को वैदिक कर्मकांड की दीक्षा दी। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए उन्होंने सामाजिक सुधार पर जोर दिया।
*विवेचना*: शर्मा जी का योगदान धार्मिक समानता पर था, जो दलित नेताओं के राजनीतिक प्रयासों से अलग। आजादी से पहले यह कार्य विषमता मिटाने का आध्यात्मिक माध्यम था।
#### 6. *भगत फूलसिंह: हरियाणा में सामाजिक न्याय*
भगत फूलसिंह ने हरियाणा में नारी शिक्षा और दलित उत्थान के लिए कार्य किया। उन्होंने दलितों के लिए कुआं खुदवाया और पानी उपलब्ध कराया। आर्य समाजी होने के नाते उन्होंने छुआछूत विरोधी अभियान चलाया, गुरुकुल स्थापित किए और सामाजिक सुधार में बलिदान दिया।
*विवेचना*: फूलसिंह जी के प्रयास व्यावहारिक थे, जो दलितों को दैनिक जीवन में समानता देते थे। आजादी से पूर्व यह विषमता मिटाने का ग्रामीण स्तर का कार्य था।
#### समग्र विवेचना और निष्कर्ष
ये ब्राह्मण सुधारक—गंगाराम, मालवीय, सोमनाथ, सावरकर, श्रीराम शर्मा और फूलसिंह—ने दलित उत्थान के लिए धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक स्तर पर कार्य किया, जो दलित नेताओं के राजनीतिक-कानूनी संघर्ष से भिन्न था। दलित नेताओं ने आरक्षण और संवैधानिक अधिकारों पर फोकस किया, लेकिन ब्राह्मणों ने आजादी से पहले मंदिर प्रवेश, शुद्धि, अनशन और पुरोहिती जैसे कार्य किए, जो हिंदू समाज की आंतरिक विषमता मिटाते थे। यह प्रयास प्रगतिशील थे, लेकिन पूर्ण नहीं—फिर भी, वे दलित जागृति की नींव बने। आज के भारत में ये इतिहास हमें सामाजिक एकता की याद दिलाते हैं।