
adiwasi school thik karo
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दिपके ने नागपुर प्रेस क्लब में एक पत्रकार परिषद (प्रेस कॉन्फ्रेंस) को संबोधित करते हुए आदिवासी छात्रों और स्कूलों की दशा सुधारने के लिए ‘आवासी स्कूल ठीक करो’ (Adivasi School Thik Karo) नामक एक नए देशव्यापी अभियान की औपचारिक घोषणा की है।
यह अभियान 17 सितंबर 2026 से महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से शुरू किया जा रहा है, जिसके तहत पार्टी के प्रतिनिधि विभिन्न आदिवासी स्कूलों का दौरा कर वहां की बुनियादी सुविधाओं का जायजा लेंगे।
📋 पत्रकार परिषद और नए अभियान की मुख्य बातें:
- आश्रम स्कूलों की खराब स्थिति का आरोप: प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अभिजीत दिपके ने आरोप लगाया कि देश में पिछले 80 वर्षों से सरकारी तंत्र द्वारा आदिवासी स्कूलों की घोर अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा कि जिन हालातों में बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं, वह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।
- छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर उठाए सवाल: adiwasi school thik karo दिपके ने दावा किया कि महाराष्ट्र के आदिवासी आश्रम स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्याप्त बेड्स न होने के कारण बच्चों को जमीन पर सोना पड़ता है, जिससे सांप काटने (स्नेक बाइट) की घटनाएं होती हैं। इसके साथ ही उन्होंने स्कूलों में मिलने वाले भोजन की खराब गुणवत्ता और लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया।
- छात्रों से संवाद: नागपुर में अभियान की घोषणा के दौरान उन्होंने आदिवासी छात्रों और हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थियों से सीधी बातचीत भी की। छात्रों ने हॉस्टल में सुरक्षा व्यवस्था की कमी और 200 से अधिक छात्रों के बीच मात्र 3 वॉशरुम होने जैसी गंभीर समस्याओं को उनके सामने रखा।
- देशव्यापी विस्तार की योजना: adiwasi school thik karo गढ़चिरौली से शुरुआत करने के बाद, कॉकरोच जनता पार्टी की टीम इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए राजस्थान, झारखंड, ओडिशा और गुजरात जैसे अन्य राज्यों के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी ले जाएगी ताकि वहां के सरकारी स्कूलों का सोशल ऑडिट किया जा सके।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आदिवासी अधिकारों और बच्चों के सामने आने वाली चुनौतियों पर बात करते हुए दिपके काफी भावुक भी नजर आए। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य आदिवासी छात्रों के साथ होने वाले कथित भेदभाव को समाप्त करना और बदहाल हो चुकी शैक्षणिक व्यवस्थाओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना है।






