
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
**सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: चेक बाउंस मामलों में हाईकोर्ट की धारा 482 सीआरपीसी के तहत शक्तियों पर लगाम**
नई दिल्ली, 19 दिसंबर 2025: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एम/एस श्री ओम सेल्स बनाम अभय कुमार @ अभय पटेल एवं अन्य (2025 INSC 1474) मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भूयान की खंडपीठ ने नेगोशिएबल इंस्ट्रुमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 (चेक बाउंस) के मामलों में हाईकोर्ट की धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत कार्यवाही रद्द करने की शक्तियों की सीमाओं को स्पष्ट किया है।
अदालत ने कहा कि यदि शिकायत में धारा 138 के अपराध के सभी आवश्यक तत्व (जैसे चेक जारी करना, डिशऑनर होना, नोटिस और भुगतान न होना) स्पष्ट रूप से उजागर होते हैं, तो हाईकोर्ट पूर्व-विचारण चरण में यह गहन जांच (रोविंग इंक्वायरी) नहीं कर सकती कि चेक कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या दायित्व के निर्वहन के लिए जारी किया गया था या नहीं। यह प्रश्न विचारण के दौरान ही तय किया जाना चाहिए, क्योंकि धारा 139 एनआई एक्ट के तहत चेक के ऋण के लिए जारी होने का वैधानिक अनुमान (प्रिजंप्शन) होता है, जिसे आरोपी केवल विचारण अदालत में सबूत पेश करके या अकाट्य सामग्री से ही खंडित कर सकता है।
इस मामले में पटना हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका पर चेक बाउंस की शिकायत को रद्द कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और मजिस्ट्रेट अदालत में कार्यवाही बहाल कर दी। अदालत ने जोर दिया कि धारा 482 का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में न्याय के हित में या प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जा सकता है, न कि विवादित तथ्यों की पूर्व-विचारण जांच के लिए।
यह फैसला लाखों लंबित चेक बाउंस मामलों को प्रभावित करेगा और शिकायतकर्ताओं के लिए राहत प्रदान करेगा।
### हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं पर प्रभाव
यह निर्णय हाईकोर्ट्स में धारा 482 सीआरपीसी के तहत लंबित उन याचिकाओं को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा, जिनमें आरोपी चेक बाउंस कार्यवाही को इस आधार पर रद्द करने की मांग कर रहे हैं कि कोई “कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या दायित्व” (legally enforceable debt/liability) मौजूद नहीं था।
– **संभावित प्रभाव**: अब हाईकोर्ट्स ऐसी याचिकाओं को खारिज करने की अधिक संभावना रखेंगी, यदि शिकायत में अपराध के मूल तत्व प्रथम दृष्टया (prima facie) मौजूद हैं। अदालतें विवादित तथ्यों (जैसे चेक सिक्योरिटी के लिए था, या ऋण चुकाया जा चुका था) की गहन जांच नहीं करेंगी, क्योंकि यह विचारण का विषय है। इससे कई याचिकाएं खारिज हो सकती हैं, और मामले विचारण अदालतों में आगे बढ़ेंगे।
– **लाभ शिकायतकर्ता को**: यह फैसला शिकायतकर्ताओं (चेक धारकों) के पक्ष में है, क्योंकि पूर्व में कई हाईकोर्ट्स ऐसे आधारों पर कार्यवाही रद्द कर देती थीं, जिससे मामले लंबे समय तक रुक जाते थे।
– **अपवाद**: यदि शिकायत स्पष्ट रूप से अपराध के तत्व नहीं दर्शाती, या प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है (जैसे चेक पूरी तरह अलग संदर्भ का है), तो रद्द करना अभी भी संभव है, लेकिन ऐसे मामले दुर्लभ होंगे।
### आरोपी के लिए उपलब्ध विकल्प
इस फैसले के बाद आरोपी के लिए धारा 482 के तहत रद्द कराना कठिन हो गया है। मुख्य विकल्प निम्नलिखित हैं:
1. **विचारण में बचाव करना**: मुख्य विकल्प विचारण अदालत में जाना है। आरोपी धारा 139 के अनुमान को खंडित करने के लिए सबूत पेश कर सकता है (जैसे चेक ब्लैंक साइन दिया गया था, सिक्योरिटी था, या ऋण अवैध था)। यदि अनुमान सफलतापूर्वक खंडित हो जाता है, तो बरी होना संभव है।
2. **समझौता/सुलह (Compounding)**: नेगोशिएबल इंस्ट्रुमेंट्स एक्ट की धारा 147 के तहत यह अपराध समझौते योग्य (compoundable) है। यदि शिकायतकर्ता सहमत हो, तो दोनों पक्ष समझौता कर सकते हैं, राशि का भुगतान कर कार्यवाही समाप्त कराई जा सकती है। समझौते पर हाईकोर्ट धारा 482 के तहत भी कार्यवाही रद्द कर सकती है (सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में समझौते पर रद्द करने की अनुमति दी है)।
3. **डिस्चार्ज की अर्जी (यदि लागू हो)**: समन केस होने के कारण सीधे डिस्चार्ज का प्रावधान सीमित है, लेकिन नोटिस ऑफ एक्जामिनेशन या अन्य चरणों में दलीलें दी जा सकती हैं।
4. **अपील/रिवीजन**: यदि मजिस्ट्रेट दोषसिद्धि देता है, तो सेशन कोर्ट/हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है, जहां अनुमान खंडन के आधार पर राहत मिल सकती है।
5. **समयबद्ध विचारण का अनुरोध**: आरोपी तेज विचारण की मांग कर सकता है, क्योंकि धारा 138 के मामले तेजी से निपटाए जाने चाहिए।
कुल मिलाकर, यह फैसला आरोपी को विचारण का सामना करने या समझौते की ओर प्रेरित करेगा, न कि पूर्व-विचारण रद्द करने की आसान राह प्रदान करेगा।