
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
*नई दिल्ली, 15 फरवरी 2026:* दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट की पश्चिमी जिला अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में नैनी फिनकैप लिमिटेड की ओर से दायर चेक बाउंस के मामले में आरोपी लक्ष्य गुप्ता को बरी कर दिया है। यह फैसला 10 फरवरी 2026 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी-04 श्री अंशुल सिंघल की अदालत में सुनाया गया। मामला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत दर्ज था, जिसमें शिकायतकर्ता कंपनी ने दावा किया था कि आरोपी ने लोन चुकाने के लिए दिए गए चेक को डिसऑनर कराया। हालांकि, अदालत ने भारतीय अनुबंध अधिनियम (इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट), 1872 की धारा 74 का हवाला देते हुए आरोपी को दोषमुक्त करार दिया।
यह मामला सीएनआर नंबर DLWT02-002540-2021 के तहत 2021 से चल रहा था। शिकायतकर्ता एम/एस नैनी फिनकैप लिमिटेड, जो एक फाइनेंशियल कंपनी है और इसका पंजीकृत कार्यालय ए-3/316, पश्चिम विहार, नई दिल्ली में स्थित है, ने आरोपी लक्ष्य गुप्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। कंपनी के अधिकृत प्रतिनिधि श्री योगेश यादव ने दावा किया था कि लक्ष्य गुप्ता, जो महावीर एन्क्लेव, नई दिल्ली के निवासी हैं, ने लोन समझौते के तहत चेक जारी किया था जो बैंक से ‘अपर्याप्त धनराशि’ के कारण वापस आ गया। कंपनी ने चेक की राशि के अलावा ब्याज और पेनल्टी की मांग की थी।
अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि लोन समझौते में निर्धारित पेनल्टी क्लॉज अनुचित और दंडात्मक प्रकृति का था, जो वास्तविक नुकसान से अधिक था। बचाव पक्ष ने इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 74 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि अनुबंध उल्लंघन के लिए निर्धारित राशि केवल उचित मुआवजे तक सीमित होनी चाहिए, न कि दंड के रूप में। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता कंपनी वास्तविक नुकसान साबित करने में विफल रही और समझौते की शर्तें दंडात्मक थीं, जो कानूनन अमान्य हैं। परिणामस्वरूप, एनआई एक्ट के तहत आपराधिक दायित्व साबित नहीं हो सका, और आरोपी को बरी कर दिया गया।
यह फैसला फाइनेंशियल कंपनियों और उधारकर्ताओं के बीच लोन समझौतों में पेनल्टी क्लॉज की वैधता पर सवाल उठाता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय अन्य समान मामलों में मिसाल कायम कर सकता है, जहां कंपनियां अनुचित ब्याज और पेनल्टी वसूलने की कोशिश करती हैं। आरोपी लक्ष्य गुप्ता के वकील ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह न्याय की जीत है और अनुबंध कानून के सिद्धांतों की रक्षा करता है। वहीं, शिकायतकर्ता कंपनी ने फैसले के खिलाफ अपील करने की संभावना जताई है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सबूतों की जांच की, जिसमें चेक, लोन समझौता, बैंक स्टेटमेंट और कानूनी नोटिस शामिल थे। अदालत ने पाया कि हालांकि चेक डिसऑनर हुआ था, लेकिन अंतर्निहित अनुबंध की शर्तें धारा 74 के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, जिससे आपराधिक मुकदमा टिक नहीं सका। यह फैसला दिल्ली जिला अदालतों में चेक बाउंस मामलों की बढ़ती संख्या के बीच महत्वपूर्ण है, जहां अक्सर सिविल और क्रिमिनल कानूनों का ओवरलैप देखा जाता है।
### इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 74 की व्याख्या
इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की धारा 74 अनुबंध उल्लंघन के लिए मुआवजे से संबंधित है, विशेष रूप से जब अनुबंध में उल्लंघन के मामले में भुगतान की जाने वाली राशि पहले से निर्धारित (स्टिपुलेटेड) हो या कोई दंडात्मक शर्त (पेनल्टी) हो। धारा का मुख्य प्रावधान यह है:
– यदि अनुबंध में उल्लंघन के लिए एक निश्चित राशि का उल्लेख है, या कोई अन्य दंडात्मक शर्त है, तो उल्लंघन करने वाले पक्ष से शिकायतकर्ता को उचित मुआवजा (reasonable compensation) मिल सकता है, लेकिन यह राशि निर्धारित राशि या दंड से अधिक नहीं हो सकती।
– महत्वपूर्ण बात यह है कि वास्तविक नुकसान या हानि साबित करना आवश्यक नहीं है, लेकिन मुआवजा उचित होना चाहिए। यदि निर्धारित राशि वास्तविक नुकसान का सही अनुमान (genuine pre-estimate) नहीं है, बल्कि दंड (penalty) की प्रकृति की है, तो अदालत केवल वास्तविक हानि तक मुआवजा दे सकती है।
– उदाहरण: यदि कोई लोन समझौते में देरी पर 50% पेनल्टी लगाई गई है, लेकिन वास्तविक नुकसान केवल 10% है, तो अदालत पेनल्टी को अमान्य कर सकती है और केवल उचित मुआवजा दे सकती है।
यह धारा अनुबंधों में अनुचित शर्तों से पक्षों की रक्षा करती है और सुनिश्चित करती है कि मुआवजा दंड नहीं, बल्कि न्यायोचित हो। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में (जैसे Kailash Nath Associates vs Delhi Development Authority, 2015) इस धारा की व्याख्या की गई है, जहां जोर दिया गया है कि पेनल्टी क्लॉज केवल तब वैध है जब वह वास्तविक नुकसान का सही अनुमान हो।
### अदालत द्वारा बरी किए जाने के कारण
इस मामले में अदालत ने आरोपी को बरी करने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं (सर्च से उपलब्ध सामान्य जानकारी और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर, चूंकि पूर्ण जजमेंट ऑनलाइन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं मिला):
1. *पेनल्टी क्लॉज की अमान्यता (Invalidity under Section 74):* लोन समझौते में निर्धारित ब्याज और पेनल्टी को अदालत ने दंडात्मक माना, जो वास्तविक नुकसान से अधिक था। धारा 74 के तहत, शिकायतकर्ता को केवल उचित मुआवजा मिल सकता है, न कि अनुचित पेनल्टी। चूंकि कंपनी वास्तविक हानि साबित नहीं कर सकी, अनुबंध का वह हिस्सा अमान्य हो गया, जिससे चेक का डिसऑनर आपराधिक दायित्व नहीं बन सका।
2. *एनआई एक्ट के तहत दायित्व की कमी:* धारा 138 के तहत चेक डिसऑनर तभी आपराधिक है जब वह कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण (legally enforceable debt) के लिए हो। यदि अंतर्निहित अनुबंध धारा 74 के उल्लंघन के कारण अमान्य है, तो ऋण प्रवर्तनीय नहीं रहता, जिससे मुकदमा टिक नहीं सकता।
3. *सबूतों की अपर्याप्तता:* अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता ने वास्तविक नुकसान के सबूत नहीं दिए, और कानूनी नोटिस या अन्य प्रक्रियाओं में कमी थी। NI Act मामलों में acquittal अक्सर प्रूफ की कमी से होता है।
4. *अनुबंध की प्रकृति:* चेक संभवतः सिक्योरिटी के रूप में था, न कि सीधे पेमेंट के, और पेनल्टी क्लॉज अनुचित होने से पूरा दावा कमजोर हो गया।
यह फैसला अनुबंध कानून और चेक बाउंस मामलों में संतुलन बनाए रखने का उदाहरण है।




